प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हाल ही में देश की जनता से एक साल तक सोना न खरीदने की अपील की थी। इसके पीछे सरकार का उद्देश्य विदेशी मुद्रा भंडार (Forex Reserves) पर पड़ रहे दबाव को कम करना है। सरकार का मानना है कि अगर देश के लोग एक साल तक सोना न खरीदें, तो सोने के आयात में कमी आएगी। साथ ही इससे विदेशी मुद्रा भंडार में स्थिरता आएगी।
दिलचस्प बात ये है कि एक ओर जहां सरकार आम लोगों से सोना खरीदने की अपील कर रही है। वहीं, खुद सोना खदीरकर अपने भंडार भर रही है। भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के पास अभी 880.5 टन सोना है। यह ऑल टाइम हाई है। आईबीआई ने 2021 से लेकर 2025 तक 185 टन सोना खरीदा था। जबकि, 2025-26 में सरकार ने 168.6 टन सोना खरीद लिया है। साथ ही विदेशों में रखे सोने को देश वापस मंगवाया है। ऐसे में सवाल उठता है कि सरकार जब खुद सोना खरीद रही है तो आम जनता को मना क्यों कर रही है? क्या दूसरे देश भी सोना खरीद रहे हैं? विदेशी तिजोरियों में भारत का कितना सोना बचा है? और क्या भविष्य में डॉलर की जगह सोना ही मुख्य मुद्रा होगा?
विदेशों से सोना वापस क्यों ला रहा है भारत?
भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) अपना सोना विदेशों से वापस भारत ला रहा है। इसके पीछे कई बड़े कारण हैं।
सुरक्षा और पूर्ण नियंत्रण: भारत पहले अपना काफी सोना विदेशी बैंकों की तिजोरियों में रखता था। लेकिन अब RBI चाहता है कि ज्यादा से ज्यादा सोना भारत में ही रहे, ताकि उस पर भारत का पूर्ण नियंत्रण हो। 2023 में भारत के कुल सोने का केवल 38% हिस्सा देश में था, लेकिन अब यह बढ़कर लगभग 77% हो गया है। यानी करीब 680 टन सोना अब भारत की तिजोरियों में रखा गया है।
अमेरिका और पश्चिमी देशों के प्रतिबंधों का डर: 2022 रूस-यूक्रेन युद्ध के दौरान अमेरिका ने रूस के लगभग 300 बिलियन डॉलर के विदेशी भंडार को फ्रीज कर दिया था। इस एक फैसले ने युद्ध में रूस को बड़ा झटका दिया था। हालांकि, रूस के पास तेल और गैस के भंडार हैं। जिससे उसने चीन, भारत और उत्तर कोरिया जैसे देशों को सस्ता तेल बेचकर अपने घाटे की वसूली कर ली। लेकिन भारत जैसे देश जिनके पास ऐसे कोई भंडार नहीं है, वो उन्हें इस बात का डर सताने लगा कि, अगर भविष्य में किसी देश से विवाद हुआ तो अमेरिका उसकी विदेशी संपत्तियों को रोक सकता है। इसलिए भारत अब डॉलर और विदेशी बैंकों पर अपनी निर्भरता कम करना चाहता है।
डॉलर पर निर्भरता कम करना: इसे ‘डी-डॉलराइजेशन’ कहा जाता है। डॉलर की कीमत लगातार बदलती रहती है और अमेरिका की नीतियों का असर पूरी दुनिया पर पड़ता है। ऐसे में भारत अपने विदेशी मुद्रा भंडार में सोने की हिस्सेदारी बढ़ाना चाहता है। सोना ऐसी संपत्ति है जिसकी कीमत लंबे समय तक सुरक्षित मानी जाती है।
आर्थिक संप्रभुता कायम करने की इच्छा: अगर किसी वैश्विक संकट, युद्ध या प्रतिबंध जैसी स्थिति पैदा हो जाए, तो अपने देश में रखा सोना तुरंत इस्तेमाल किया जा सकता है। इससे भारत को आर्थिक सुरक्षा मिलती है।
क्या दूसरे देश भी अपना सोना वापस मंगवा रहे हैं?
दुनिया में फिलहाल युद्ध और मंदी का दौर चल रहा है। ऐसे में भारत के अलावा दूसरे देश भी डॉलर पर अपनी निर्भरता कम करने की कोशिश कर रहे हैं। इसमें पहला चरण विदेशों में पड़े अपने सोने को वापस मंगवाना है। इसी का नतीजा है कि भारत आज गोल्ड रिजर्व के मामले में 5वें नंबर पर है। भारत के अलावा चीन, ब्राजील, तुर्की और पोलैंड जैसे देश भी तेजी से सोना खरीद रहे हैं। चीन पिछले कई महीनों से लगातार सोना जमा कर रहा है और उसके पास 2300 टन से ज्यादा सोना है।
गोल्ड रिजर्व के मामले में 5वें स्थान पर पहुंचा भारत (AI जनरेटेड फोटो)
वर्ल्ड गोल्ड काउंसिल के एक सर्वे के अनुसार, दुनिया के लगभग 76% केंद्रीय बैंक अगले 5 सालों में अपना गोल्ड रिजर्व बढ़ाना चाहते हैं। वहीं 73% बैंकों को लगता है कि भविष्य में डॉलर की ताकत कम हो सकती है। इसका मुख्य कारण वही है जो भारत के साथ है। हालांकि सभी देश अपना सोना भारत की तरह वापस नहीं ला रहा, लेकिन अधिकतर देश अपने भंडार में सोने की हिस्सेदारी जरूर बढ़ा रहे हैं।
विदेशी तिजोरियों में भारत का कितना सोना बचा है?
भारतीय रिजर्व बैंक के पास इस समय कुल लगभग 880.5 टन सोना है। इसमें से करीब 680 टन सोना भारत में रखा गया है। इसके अलावा लगभग 197 टन सोना अभी भी विदेशी तिजोरियों में रखा हुआ है। कुछ सोना “गोल्ड डिपॉजिट” में भी निवेश किया गया है, जिससे ब्याज मिलता है। भारत धीरे-धीरे अपना ज्यादा से ज्यादा सोना देश में ला रहा है। यही वजह है कि कुछ साल पहले जो सोना विदेशों में ज्यादा रखा जाता था, अब उसका बड़ा हिस्सा भारत में सुरक्षित रखा जा रहा है।
सोने के आयात से भारतीय रुपये पर क्या असर पड़ता है?
भारत अपनी जरूरत का लगभग पूरा सोना विदेशों से खरीदता है। इसके लिए भुगतान डॉलर में करना पड़ता है। जब भारत ज्यादा सोना आयात करता है, तो देश से ज्यादा डॉलर बाहर जाते हैं। इससे विदेशी मुद्रा भंडार पर दबाव बढ़ता है और रुपया कमजोर होने लगता है।
भारत के कुल आयात बिल में सोने की हिस्सेदारी काफी बड़ी है। अगर अंतरराष्ट्रीय बाजार में सोने की कीमत बढ़ जाए, तो भारत को ज्यादा डॉलर खर्च करने पड़ते हैं। इससे रुपये की स्थिति और कमजोर हो सकती है। उदाहरण के तौर पर, अगर भारत कम मात्रा में भी सोना खरीदे लेकिन कीमतें बहुत ज्यादा हों, तब भी ज्यादा डॉलर खर्च होंगे। यही कारण है कि सरकार कई बार लोगों से जरूरत से ज्यादा सोना खरीदने से बचने की अपील करती है।
क्या भविष्य में डॉलर की जगह ले लेगा सोना ?
अभी ऐसा कहना सही नहीं होगा कि सोना पूरी तरह डॉलर की जगह ले लेगा। लेकिन इतना जरूर है कि दुनिया में डॉलर पर भरोसा पहले जैसा नहीं रह गया है। रूस-यूक्रेन युद्ध के बाद कई देशों को लगा कि अमेरिका डॉलर और बैंकिंग सिस्टम का इस्तेमाल दबाव बनाने के लिए कर सकता है। इसी कारण अब कई देश डॉलर की बजाय सोने को ज्यादा सुरक्षित मान रहे हैं। सोने की सबसे बड़ी ताकत यह है कि यह किसी एक देश के नियंत्रण में नहीं होता। इसे किसी भी देश में बेचकर दूसरी मुद्रा प्राप्त की जा सकती है। इसलिए इसे सुरक्षित संपत्ति माना जाता है।









