देश में डिजिटल पेमेंट के सबसे बड़े माध्यमों में शामिल UPI को लेकर नई बहस शुरू हो गई है। ₹2,000 से अधिक के कुछ मर्चेंट UPI लेनदेन पर MDR लागू किए जाने के प्रस्ताव के बाद सरकार के फैसले को लेकर राजनीतिक और कानूनी विवाद तेज हो गया है।
इसी बीच नीति आयोग के उपाध्यक्ष अशोक कुमार लाहिड़ी की टिप्पणी भी चर्चा में है। उन्होंने स्पष्ट किया कि UPI शुल्क को लेकर उनकी बात व्यक्तिगत राय है और इसे नीति आयोग का आधिकारिक रुख नहीं माना जाना चाहिए। उनका तर्क है कि किसी भी भुगतान व्यवस्था को लंबे समय तक पूरी तरह सब्सिडी पर नहीं चलाया जा सकता और उसकी लागत का कुछ हिस्सा लिया जाना स्वाभाविक है।
लाहिड़ी ने अपने तर्क को समझाने के लिए चाणक्य नीति का उदाहरण भी दिया। उन्होंने कहा कि जिस तरह मधुमक्खी फूल को नुकसान पहुंचाए बिना शहद इकट्ठा करती है, उसी तरह सरकार को भी जनता पर अत्यधिक बोझ डाले बिना राजस्व जुटाना चाहिए।
हालांकि, इस व्यवस्था को लेकर दूसरी ओर सवाल भी उठ रहे हैं। आलोचकों का कहना है कि डिजिटल भुगतान को बढ़ावा देने के बाद उस पर शुल्क लगाने से छोटे कारोबारियों और उपभोक्ताओं पर अतिरिक्त आर्थिक दबाव पड़ सकता है। खासकर कम मार्जिन वाले कारोबारों के लिए प्रत्येक लेनदेन पर लगने वाला शुल्क महत्वपूर्ण हो सकता है।
मामला अब कानूनी चुनौती तक पहुंच गया है। सुप्रीम कोर्ट में दायर जनहित याचिका में प्रस्तावित MDR व्यवस्था की वैधता और इसके लागू किए जाने की प्रक्रिया पर सवाल उठाए गए हैं। याचिका में पारदर्शिता, पर्याप्त कानूनी सुरक्षा और सार्वजनिक परामर्श जैसे मुद्दे भी उठाए गए हैं।
फिलहाल UPI शुल्क को लेकर दो प्रमुख सवाल सामने हैं—क्या डिजिटल भुगतान व्यवस्था की लागत का कुछ हिस्सा उपयोगकर्ताओं या व्यापारियों से लिया जाना चाहिए और यदि हां, तो इसका ढांचा ऐसा कैसे हो जिससे डिजिटल पेमेंट की पहुंच और इस्तेमाल पर प्रतिकूल असर न पड़े।









