चुनावी राज्यों में कांग्रेस के भीतर बढ़ती गुटबाजी और नेतृत्व को लेकर उठते सवालों ने पार्टी के सामने नई चुनौतियां खड़ी कर दी हैं। केरल में वरिष्ठ नेता मणिशंकर अय्यर के बयान से उपजे विवाद से लेकर असम में भूपेन बोरा के इस्तीफे और फिर वापसी तक- पार्टी के भीतर असंतोष खुलकर सामने आया है। केरल, असम, तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल जैसे महत्वपूर्ण राज्यों में पार्टी के भीतर उठते विरोध के स्वर और सहयोगियों के साथ बढ़ते तनाव ने केंद्रीय नेतृत्व की चिंताएं बढ़ा दी हैं।
केरल: मणिशंकर अय्यर के बयान से पार्टी असहज
केरल में वरिष्ठ कांग्रेस नेता मणिशंकर अय्यर के एक बयान ने पार्टी को भारी शर्मिंदगी में डाल दिया है। अय्यर ने भविष्यवाणी की है कि मुख्यमंत्री पिनाराई विजयन के नेतृत्व वाली LDF सरकार लगातार तीसरी बार सत्ता में वापसी करेगी।
विवाद की जड़: अय्यर ने न केवल विजयन की जीत का दावा किया, बल्कि उनके शासन को शानदार भी बताया।
अय्यर का तर्क: पार्टी द्वारा पल्ला झाड़ने के बावजूद अय्यर अपने बयान पर कायम हैं। उन्होंने कहा- एक कांग्रेसी के रूप में मैं चाहता हूं कि UDF जीते, लेकिन एक गांधीवादी होने के नाते मैं सच बोलने के लिए बाध्य हूं। मुझे लगता है कि वे (विजयन) एक और कार्यकाल पाने जा रहे हैं।
ऐतिहासिक संदर्भ: केरल में पारंपरिक रूप से हर पांच साल में सत्ता परिवर्तन (UDF और LDF के बीच) होता रहा है, लेकिन 2021 में विजयन ने दोबारा जीतकर इस चक्र को तोड़ दिया था। अय्यर की टिप्पणी ने कांग्रेस की सत्ता में वापसी की कोशिशों को बड़ा झटका दिया है।
असम: भूपेन बोरा का इस्तीफा और ‘हाई-वोल्टेज’ ड्रामा
असम में प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष भूपेन कुमार बोरा के इस्तीफे ने पार्टी के भीतर मचे घमासान को उजागर कर दिया। बोरा ने पार्टी अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे को अपना इस्तीफा भेजा था। उनका आरोप था कि पार्टी नेतृत्व उन्हें नजरअंदाज कर रहा है और राज्य इकाई में उन्हें उचित सम्मान नहीं मिल रहा है। उन्होंने ‘बेहाली प्रकरण’ और ‘माजुली यात्रा’ से जुड़े निर्णयों पर असंतोष जताया था। हालांकि, राहुल गांधी और केंद्रीय नेतृत्व के हस्तक्षेप के बाद बोरा ने अपना इस्तीफा वापस ले लिया है।
असम में बीजेपी के हिमंता बिस्वा सरमा के मजबूत नेतृत्व के सामने कांग्रेस लंबे समय से संघर्ष कर रही है। पार्टी के भीतर असंतोष बढ़ रहा है, और मुस्लिम नेताओं में यह भावना घर कर गई है कि उन्हें पर्याप्त महत्व नहीं दिया जा रहा। राहुल गांधी के लिए यह राज्य विशेष रूप से महत्वपूर्ण है, क्योंकि यहां सीधे बीजेपी से मुकाबला है, लेकिन आंतरिक कलह ने स्थिति और जटिल बना दी है।
भाजपा का कटाक्ष: मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने इस घटनाक्रम को कांग्रेस का गहराता संकट बताया। गौरतलब है कि 2015 में सरमा ने भी इसी तरह कांग्रेस छोड़ी थी, जिसके बाद असम में पार्टी का पतन शुरू हो गया था।
तमिलनाडु: DMK के साथ गठबंधन में दरार
तमिलनाडु में कांग्रेस की सबसे बड़ी टेंशन DMK के साथ गठबंधन है। मुख्यमंत्री एम.के. स्टालिन ने दो टूक कहा है कि चुनाव के बाद कोई सत्ता साझेदारी नहीं होगी। कांग्रेस के कुछ नेताओं द्वारा ज्यादा सीटों और सरकार में हिस्सेदारी की मांग पर स्टालिन ने इसे ‘षड्यंत्र’ करार दिया है। डीएमके के वरिष्ठ नेताओं ने कांग्रेस की मांगों पर सख्त रुख अपनाया है और गठबंधन में दरार की आशंका बढ़ गई है। कांग्रेस नेता मणिक्कम टैगोर ने स्टालिन के प्रति वफादारी जताई है, लेकिन सीट-बंटवारे और स्थानीय चुनावों में आरक्षण जैसे मुद्दों पर खींचतान जारी है।
मणिकम टैगोर जैसे कांग्रेस नेताओं ने चेतावनी दी है कि पार्टी को किनारे करने के राजनीतिक परिणाम हो सकते हैं। अभिनेता से नेता बने विजय की पार्टी (TVK) के उभार ने राज्य के समीकरणों को और जटिल बना दिया है, जिससे कांग्रेस के पास विकल्पों की तलाश का दबाव बढ़ गया है। राहुल गांधी के लिए यह गठबंधन टूटने का खतरा सबसे बड़ा सिरदर्द बन गया है, क्योंकि तमिलनाडु में DMK के बिना कांग्रेस की स्थिति और कमजोर हो जाएगी।
पश्चिम बंगाल: ‘एकला चलो’ की राह पर कांग्रेस और TMC
पश्चिम बंगाल में ‘इंडिया’ गठबंधन के दो प्रमुख घटक दल- कांग्रेस और तृणमूल कांग्रेस (TMC) एक-दूसरे के खिलाफ खड़े नजर आ रहे हैं। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने 2026 के विधानसभा चुनाव में अकेले लड़ने का ऐलान किया है। जवाबी कार्रवाई में कांग्रेस आलाकमान ने भी राज्य की सभी 294 सीटों पर अकेले चुनाव लड़ने का फैसला किया है। राष्ट्रीय स्तर पर साथ होने के बावजूद, बंगाल में दोनों दलों के बीच चुनावी तालमेल पूरी तरह विफल रहा है।
भाजपा का हमला
भाजपा प्रवक्ता प्रदीप भंडारी ने इस स्थिति पर चुटकी लेते हुए कहा कि जो लोग जीवन भर कांग्रेस में रहे, वे अब राहुल गांधी के खिलाफ बोल रहे हैं। उन्होंने अय्यर के उस बयान को साझा किया जिसमें उन्होंने कथित तौर पर खुद को “राहुलवादी नहीं, बल्कि राजीववादी” बताया था। भाजपा का कहना है कि जब खुद के नेता ही नेतृत्व पर भरोसा नहीं कर रहे, तो जनता कैसे करेगी।








