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ट्रैफिक व्यवस्था के नाम पर “नंबर गेम” – आम जनता के साथ हो रही ज्यादती पर सवाल

रायपुर। शहर की ट्रैफिक व्यवस्था इन दिनों एक गंभीर बहस का विषय बन चुकी है। जहां एक ओर सड़क पर आम नागरिक रोजाना जाम, अव्यवस्था और हादसों से जूझ रहा है, वहीं दूसरी ओर ट्रैफिक विभाग की प्राथमिकताएं पूरी तरह सवालों के घेरे में हैं।

देखा जा रहा है कि दिन के समय जब तापमान 40 से 43 डिग्री तक पहुंच जाता है और शहर की सड़कों पर लंबा जाम लगता है, तब ट्रैफिक व्यवस्था लगभग नदारद रहती है। चौराहों पर खड़े आम लोग घंटों पसीना बहाते रहते हैं, लेकिन व्यवस्था सुधारने की बजाय विभाग की सक्रियता कहीं नजर नहीं आती। उस समय न तो यातायात नियंत्रण की ठोस कोशिश दिखती है और न ही जनता को राहत देने की कोई पहल।

लेकिन जैसे ही रात होती है, अचानक ट्रैफिक विभाग पूरी तरह सक्रिय हो जाता है। सड़कों की हालत, गड्ढे, अंधेरा और खतरे जस के तस रहते हैं, पर चालान काटने की प्रक्रिया तेज हो जाती है। ऐसा प्रतीत होता है कि सड़क सुरक्षा से ज्यादा प्राथमिकता “चालान की संख्या” को दी जा रही है।

आम नागरिकों का आरोप है कि ट्रैफिक पुलिस का यह रवैया अब “नंबर गेम” बन चुका है, जहां इंसानों की परेशानी से ज्यादा आंकड़ों की गिनती मायने रखती है। दिन में हो रहे हादसे और अव्यवस्था को नजरअंदाज कर रात में अचानक सख्ती दिखाना कई सवाल खड़े करता है।

इसके अलावा, यह भी देखा जा रहा है कि विभाग की वर्दी तो बेहद चमकदार और सुसज्जित नजर आती है, लेकिन ट्रैफिक व्यवस्था उतनी ही अव्यवस्थित और धुंधली बनी हुई है। इससे साफ झलकता है कि जमीनी स्तर पर सुधार की बजाय दिखावे पर ज्यादा ध्यान दिया जा रहा है।

शहर में लगातार हो रहे सड़क हादसे और बढ़ती अव्यवस्था यह संकेत देती है कि ट्रैफिक प्रबंधन की मौजूदा प्रणाली अपने मूल उद्देश्य से भटक चुकी है। जनता के मन में अब यह सवाल गहराता जा रहा है कि क्या ट्रैफिक व्यवस्था का मकसद वास्तव में लोगों की सुरक्षा सुनिश्चित करना है, या फिर सिर्फ चालान की संख्या बढ़ाना?

प्रशासन से मांग की जाती है कि ट्रैफिक व्यवस्था को “नंबर गेम” से बाहर निकालकर वास्तविक जनहित की दिशा में कार्य किया जाए। चौराहों पर प्रभावी नियंत्रण, जाम से राहत, सड़क सुरक्षा के ठोस उपाय और पारदर्शी कार्यप्रणाली को प्राथमिकता दी जाए, ताकि आम जनता को राहत मिल सके और व्यवस्था पर विश्वास कायम हो सके।

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