कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) के संस्थापक और राष्ट्रीय संयोजक अभिजीत दीपके ने ज्ञानेश कुमार के खिलाफ चल रहे अपने आंदोलन को फिलहाल रोकने का ऐलान कर राजनीतिक हलकों में हलचल बढ़ा दी है। दीपके ने त्योहार के मौके पर समर्थकों से परिवार के साथ समय बिताने और घर लौटने की अपील की है। हालांकि, उनके इस फैसले को लेकर कई तरह के सवाल भी उठ रहे हैं।
दीपके पहले यह स्पष्ट कर चुके थे कि ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे के बिना आंदोलन खत्म नहीं किया जाएगा। ऐसे में अचानक आंदोलन पर विराम लगाने के पीछे आखिर क्या वजह रही, इसे लेकर अलग-अलग कयास लगाए जा रहे हैं।
आंदोलन को लेकर बढ़ी थी रणनीतिक चिंता
जानकारों के बीच चर्चा है कि आंदोलन को लेकर उठ रहे राजनीतिक सवालों ने सीजेपी नेतृत्व की रणनीति को प्रभावित किया हो सकता है। ऑल इंडिया स्टूडेंट्स एसोसिएशन की प्रमुख नेहा बोरा और वरिष्ठ वकील प्रशांत भूषण की ओर से आंदोलन की तुलना दूसरे देशों में हुए जन आंदोलनों और सत्ता परिवर्तन की घटनाओं से किए जाने के बाद सीजेपी के सामने अपनी छवि को लेकर नई चुनौती खड़ी हो गई।
ऐसे बयानों से आंदोलन के मूल मुद्दे से ध्यान हटकर उसके पीछे की राजनीतिक मंशा पर बहस तेज होने की आशंका पैदा हुई। संभव है कि इसी वजह से नेतृत्व ने फिलहाल आंदोलन को विराम देने का फैसला किया हो, ताकि आगे की रणनीति पर नए सिरे से विचार किया जा सके।
दो सह-संयोजकों की रिहाई भी बन सकती है वजह
अभिजीत दीपके के फैसले को सौरभ दास और आशुतोष रांका से भी जोड़कर देखा जा रहा है। दोनों इस मामले में जेल में हैं और उनकी अगली पेशी को लेकर भी नजरें टिकी हुई हैं।
पिछली सुनवाई के दौरान अदालत ने उनकी रिहाई को लेकर आशंका जताई थी। ऐसे में आंदोलन को कुछ समय के लिए रोकने का फैसला एक रणनीतिक कदम भी हो सकता है। माना जा रहा है कि इससे अदालत के सामने यह संदेश देने की कोशिश की गई हो कि फिलहाल टकराव का रास्ता नहीं अपनाया जा रहा है।
हालांकि, यह कहना जल्दबाजी होगी कि आंदोलन स्थगित करने का फैसला सीधे तौर पर दोनों की रिहाई से जुड़ा है। इसकी वास्तविक वजह आने वाले दिनों में ही ज्यादा स्पष्ट हो सकेगी।
समर्थन में कमी ने भी बढ़ाई मुश्किल?
दीपके के फैसले की एक दूसरी वजह आंदोलन को मिल रहा अपेक्षित जनसमर्थन न होना भी माना जा रहा है। सीजेपी ने अलग-अलग मौकों पर बड़े कार्यक्रमों और प्रदर्शनों का ऐलान किया था, लेकिन कुछ आयोजनों में अपेक्षा के मुताबिक भीड़ नजर नहीं आई।
10 अक्टूबर के प्रदर्शन के दौरान बड़ी संख्या में लोगों को हिरासत में लिए जाने की खबर सामने आई थी। वहीं, इससे पहले 20 जुलाई के ‘संसद चलो’ मार्च में युवाओं की बड़ी भागीदारी देखने को मिली थी। दोनों आयोजनों की तुलना करने पर सीजेपी के मौजूदा आंदोलन की पहुंच और समर्थन को लेकर सवाल उठना स्वाभाविक है।
इसके बाद 16 अक्टूबर को आयोजित ‘लहरा दो तिरंगा’ कार्यक्रम को लेकर भी तस्वीर बहुत उत्साहजनक नहीं रही। ऐसे में पार्टी नेतृत्व के सामने आंदोलन को आगे बढ़ाने से पहले अपनी रणनीति और जनसमर्थन का आकलन करना जरूरी हो गया होगा।
क्या नए सिरे से शुरू होगा आंदोलन?
फिलहाल सबसे बड़ा सवाल यही है कि अभिजीत दीपके का यह फैसला स्थायी विराम है या कुछ समय के लिए लिया गया रणनीतिक ब्रेक। दीपके ने समर्थकों को परिवार के साथ समय बिताने की सलाह दी है, जिससे संकेत मिलता है कि आंदोलन को पूरी तरह खत्म करने के बजाय फिलहाल स्थगित किया गया है।
अब निगाह इस बात पर रहेगी कि आने वाले दिनों में सीजेपी किस रणनीति के साथ वापस आती है और ज्ञानेश कुमार के मुद्दे को किस तरह आगे बढ़ाती है। आंदोलन को दोबारा शुरू किया जाता है या कोई नया राजनीतिक रास्ता अपनाया जाता है, यह आने वाले घटनाक्रम से साफ होगा।









