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पाक अधिकृत जम्मू-कश्मीर (PoJK) में फिर भड़का आक्रोश

यह लेख लिखे जाने तक, पाकिस्तान के अवैध कब्जे वाले जम्मू-कश्मीर (PoJK) में स्थिति बेहद तनावपूर्ण है। एक बार फिर, वहाँ गंभीर अशांति पैदा हो गई है और अधिकारियों ने प्रदर्शनकारियों तथा विपक्षी नेताओं के खिलाफ व्यापक धरपकड़ शुरू कर दी है, जिसके साथ ही सरकार पर अत्यधिक बल प्रयोग करने के गंभीर आरोप लग रहे हैं। क्षेत्र के एक बड़े हिस्से में इंटरनेट सेवाएं निलंबित कर दी गई हैं, जिससे यह इलाका पूरी तरह से कट गया है। वहीं, रिपोर्टों के अनुसार प्रशासन ने संघीय सरकार से 14,000 अतिरिक्त सुरक्षाकर्मियों की मांग की है।


बिगड़ते हालात को देखते हुए स्थानीय अधिकारियों ने 5 जून से 20 जून के बीच पर्यटन न करने की सलाह दी है। इस्लामाबाद स्थित अमेरिकी दूतावास ने भी पीओजेके (PoJK) में मौजूद अपने नागरिकों को सावधानी बरतने के निर्देश दिए हैं।
ताजा हिंसा 7 जून, 2026 को भड़की, जब सुरक्षा बलों (SFs) और जॉइंट अवामी एक्शन कमेटी (JAAC) के समर्थकों के बीच हुई झड़पों में कम से कम 12 लोगों की मौत हो गई, जिनमें आठ नागरिक और चार पुलिसकर्मी शामिल हैं। इसके अलावा कम से कम 73 अन्य लोग — जिनमें 23 सुरक्षाकर्मी और 50 नागरिक शामिल हैं — घायल हुए हैं।


अधिकारियों का दावा है कि पीओजेके (PoJK) के सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले के बाद हिंसक भीड़ ने एक अस्पताल पर हमला किया। इस फैसले में कोर्ट ने पाकिस्तान में रह रहे भारत के केंद्र शासित प्रदेश जम्मू-कश्मीर (J&K) के शरणार्थियों के लिए आरक्षित 12 विधायी सीटों की संवैधानिक स्थिति को बरकरार रखा था। आधिकारिक बयानों के अनुसार, सुरक्षा बलों की जवाबी कार्रवाई से पहले चार पुलिस अधिकारियों और एक राहगीर की मौत हो गई थी, जिसके बाद हुई कार्रवाई में छह प्रदर्शनकारी मारे गए।
दूसरी ओर, प्रदर्शनकारियों का तर्क है कि हिंसा तब शुरू हुई जब जेएएसी (JAAC) के समर्थक एक अस्पताल के शवगृह के बाहर इकट्ठा हुए, जहाँ कार्यकर्ता शहज़ेब हबीब का शव रखा गया था, जिनकी कथित तौर पर पहले सुरक्षा बलों द्वारा गोली मारकर हत्या कर दी गई थी। उनका दावा है कि इसके बाद सुरक्षा बलों ने प्रदर्शनकारियों को निशाना बनाया।


वर्तमान अशांति सितंबर और अक्टूबर 2025 में हुए इसी तरह के विरोध प्रदर्शनों का अगला हिस्सा है, जिसमें 10 से अधिक लोगों की मौत हुई थी और 100 से अधिक घायल हुए थे। उन अशांतियों के बाद आखिरकार संघीय सरकार, पीओजेके (PoJK) प्रशासन और जेएएसी (JAAC) के प्रतिनिधियों के बीच ‘मुजफ्फराबाद समझौता’ हुआ था, जिसे ‘4 अक्टूबर का समझौता’ (October 4 Accord) भी कहा जाता है।  इस समझौते में मुआवजे, शासन सुधारों, आर्थिक राहत उपायों और राजनीतिक प्रतिबद्धताओं को शामिल किया गया था। 2025 के प्रदर्शनों के दौरान मारे गए लोगों के परिवारों को कानून प्रवर्तन कर्मियों के समान मुआवजा देने का वादा किया गया था, जबकि गोलीबारी में घायल हुए लोगों को 10 लाख पाकिस्तानी रुपये (PKR) दिए जाने थे। मृतक के परिवारों को सरकारी नौकरियां, प्रमुख घटनाओं की न्यायिक जांच और हिंसा में शामिल लोगों के खिलाफ कार्रवाई भी इसमें शामिल थी। आर्थिक उपायों के तहत बिजली के बुनियादी ढांचे के लिए 10 अरब पाकिस्तानी रुपये, गेहूं और बिजली पर सब्सिडी जारी रखने तथा कर (टैक्स) सुधारों की योजना बनाई गई थी। इस समझौते में स्वास्थ्य सेवा, शिक्षा, बुनियादी ढांचे में सुधार और 12 शरणार्थी सीटों की स्थिति की जांच के लिए एक समिति के गठन का भी प्रस्ताव था।


हालांकि बाद में अधिकारियों ने दावा किया कि जेएएसी (JAAC) की 38 मांगों में से 36 को स्वीकार कर लिया गया था, लेकिन संगठन ने इन दावों को खारिज कर दिया और 31 मई, 2026 को 9 जून, 2026 से अनिश्चितकालीन हड़ताल की घोषणा कर दी। इसी बीच, तनाव तब और बढ़ गया जब 5 जून को सरकार ने सार्वजनिक व्यवस्था और सुरक्षा का हवाला देते हुए जेएएसी (JAAC) पर प्रतिबंध लगा दिया। इसके बाद कई सदस्यों को गिरफ्तार कर लिया गया।


वर्तमान आंदोलन के केंद्र में जेएएसी (JAAC) की वह मांग है, जिसमें 53 सदस्यीय विधानसभा में उन 12 सीटों को समाप्त करने की बात कही गई है जो 1947 और 1965 के बाद पाकिस्तान में बसे जम्मू-कश्मीर के शरणार्थियों के लिए आरक्षित हैं। जेएएसी (JAAC) का तर्क है कि ये सीटें पाकिस्तान की मुख्यधारा की राजनीतिक पार्टियों को पीओजेके (PoJK) में सरकार बनाने को प्रभावित करने की अनुमति देती हैं और स्थानीय राजनीतिक प्रतिनिधित्व को कमजोर करती हैं। कई प्रदर्शनकारियों के लिए यह मुद्दा अधिक स्वायत्तता और स्थानीय नियंत्रण की मांगों का प्रतीक बन गया है।


यह विवाद तब और गहरा गया जब सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुनाया कि आरक्षित सीटें संवैधानिक रूप से सुरक्षित हैं और संवैधानिक संशोधन के बिना इन्हें समाप्त नहीं किया जा सकता। इस फैसले ने इस विवाद को सुलझाने का एक रास्ता प्रभावी रूप से बंद कर दिया और मौजूदा तनाव को बढ़ाने में भूमिका निभाई। मौजूदा आंदोलन पीओजेके (PoJK) में जन लामबंदी (सार्वजनिक एकजुटता) के चरित्र में एक महत्वपूर्ण बदलाव को दर्शाता है। जेएएसी (JAAC) की शुरुआत मूल रूप से आर्थिक शिकायतों, विशेष रूप से बिजली की बढ़ती दरों, महंगाई और शासन की विफलताओं पर ध्यान केंद्रित करने वाले एक मंच के रूप में हुई थी। भले ही शुरुआती दौर में आर्थिक चिंताओं ने इन आंदोलनों को हवा दी, लेकिन हालिया आंदोलन तेजी से राजनीतिक प्रतिनिधित्व और क्षेत्रीय मामलों पर इस्लामाबाद के प्रभाव के इर्द-गिर्द केंद्रित हो गया है।


ये शिकायतें लंबे समय से चली आ रही ढांचागत समस्याओं में निहित हैं। जब से पाकिस्तान ने 1947 में इस क्षेत्र पर नियंत्रण किया है, पीओजेके (PoJK) में स्वायत्तता, शासन, संसाधनों के आवंटन और संवैधानिक अधिकारों को लेकर समय-समय पर विरोध प्रदर्शन होते रहे हैं। इसे “आजाद” कश्मीर के रूप में पेश किए जाने के बावजूद, यहाँ के कई निवासियों का तर्क है कि राजनीतिक और प्रशासनिक निर्णय लेने की प्रक्रिया पूरी तरह से इस्लामाबाद द्वारा नियंत्रित रहती है।


प्रदर्शनों का बार-बार होना अनसुलझी राजनीतिक और आर्थिक चुनौतियों को दर्शाता है। उच्च बेरोजगारी, अपर्याप्त सार्वजनिक सेवाएं, ऊर्जा संकट और राजनीतिक रूप से अलग-थलग किए जाने की भावना लगातार जन असंतोष को बढ़ा रही है। हालांकि पिछले आंदोलनों के परिणामस्वरूप आंशिक रूप से कुछ रियायतें मिलीं, लेकिन किसी ने भी उस शासन व्यवस्था को बुनियादी तौर पर नहीं बदला जिसे कई प्रदर्शनकारी अपनी समस्याओं की जड़ मानते हैं। 27 जुलाई, 2026 को होने वाले विधानसभा चुनावों से पहले स्थिति तनावपूर्ण बने रहने की संभावना है। जेएएसी (JAAC) ने संकेत दिया है कि वह प्रतिबंध के बावजूद अपना अभियान जारी रखने का इरादा रखता है, जबकि अधिकारी बड़े पैमाने पर होने वाले विरोध प्रदर्शनों को रोकने के लिए दृढ़ संकल्पित दिखाई दे रहे हैं।


अंतरराष्ट्रीय प्रतिक्रिया अब तक सीमित लेकिन ध्यान देने योग्य रही है। ब्रिटिश सांसदों के एक समूह ने इस कार्रवाई, कार्यकर्ताओं की गिरफ्तारी और संचार व्यवस्था पर लगी पाबंदियों को लेकर चिंता जताई है। इस्लामाबाद ने इस आलोचना को अपने आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप बताते हुए खारिज कर दिया है। यह ताजा अशांति पीओजेके (PoJK) में लगातार विफल हो रही शासन व्यवस्था को उजागर करती है और दशकों से चले आ रहे अनसुलझे राजनीतिक विरोधाभासों की ओर फिर से ध्यान आकर्षित करती है। अब जनता की मांगें तेजी से राजनीतिक जवाबदेही, प्रतिनिधित्व और स्थानीय नियंत्रण पर केंद्रित हो रही हैं। जब तक इन मुद्दों को सार्थक सुधारों के माध्यम से हल नहीं किया जाता, तब तक विरोध प्रदर्शन और सरकारी दमन का यह चक्र इसी तरह जारी रहने की आशंका है।

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