रायपुर। जिस जमीन के मामले में धारा 172 के तहत भूमि उपयोग परिवर्तन की अनुमति दी गई, उसमें निर्धारित प्रक्रिया पूरी होने से पहले ही आदेश जारी किए जाने का आरोप है। नियमों के मुताबिक धारा 59 में लगान का पुनर्निर्धारण होता है, जबकि धारा 172 की अनुमति अलग प्रक्रिया के तहत दी जाती है। विवाद इसलिए गंभीर है क्योंकि संबंधित भूमि का नक्शा स्वीकृत हुए बिना ही 172 की अनुमति दिए जाने की बात सामने आई है। अंतिम आदेश एसडीएम स्तर से जारी होने के बावजूद अब इसकी जिम्मेदारी राजस्व निरीक्षक (आरआई) पर डालने की कोशिश हो रही है। सवाल सीधा है, जब अनुमति देने का अधिकार और अंतिम निर्णय एसडीएम के पास था, तो नियम विरुद्ध आदेश की जवाबदेही केवल आरआई पर कैसे तय की जा सकती है?
धारा 59 का काम अलग, 172 की अनुमति अलग
इस मामले में धारा 59 और 172 को एक ही प्रक्रिया मानने से ही विवाद पैदा हुआ है। धारा 59 के तहत लगान का पुनर्निर्धारण किया जाता है, जबकि धारा 172 भूमि के उपयोग परिवर्तन से संबंधित अनुमति की व्यवस्था है। इसलिए 172 की अनुमति के लिए निर्धारित पूर्व शर्तों का पूरा होना जरूरी है।
यदि नक्शा स्वीकृति आवश्यक शर्त थी और वह आदेश जारी होने के समय मौजूद नहीं थी, तो अनुमति की वैधता पर सीधा सवाल उठता है। ऐसी स्थिति में यह जांच जरूरी है कि एसडीएम के समक्ष कौन से दस्तावेज रखे गए और आदेश किस आधार पर पारित किया गया।
आदेश एसडीएम का, ठीकरा आरआई के सिर
प्रकरण में सबसे बड़ा सवाल जिम्मेदारी को लेकर है। आरआई का काम मैदानी जांच कर प्रतिवेदन देना हो सकता है, लेकिन अंतिम अनुमति सक्षम अधिकारी के आदेश से ही प्रभावी होती है। ऐसे में आरआई की रिपोर्ट और एसडीएम के आदेश की अलग-अलग जांच जरूरी है।
अगर रिपोर्ट में कोई तथ्य गलत था तो उसकी जिम्मेदारी तय की जा सकती है। लेकिन यदि उपलब्ध अभिलेखों से स्थिति स्पष्ट थी और इसके बावजूद एसडीएम ने 172 की अनुमति जारी की, तो निर्णय लेने वाले अधिकारी की भूमिका की जांच से बचा नहीं जा सकता।
नक्शे से पहले अनुमति हुई तो नियम किसने तोड़ा?
पूरे मामले की असली कड़ी तारीखों में छिपी है। नक्शा स्वीकृति, आरआई प्रतिवेदन, धारा 59 की कार्यवाही और धारा 172 की अनुमति—इन चारों की तारीखों का मिलान होते ही स्थिति साफ हो जाएगी।
यदि दस्तावेज बताते हैं कि नक्शा स्वीकृत होने से पहले 172 की अनुमति जारी हो चुकी थी, तो यह केवल आरआई की रिपोर्ट का मामला नहीं रहेगा। तब यह सवाल भी उठेगा कि सक्षम अधिकारी ने अनिवार्य शर्त की जांच किए बिना आदेश क्यों पारित किया।
जांच आरआई तक सीमित हुई तो बड़ा सवाल अनुत्तरित रहेगा
इस मामले में कार्रवाई का दायरा केवल आरआई की भूमिका तक सीमित करने से पूरी प्रक्रिया की जवाबदेही तय नहीं होगी। जांच में यह भी देखा जाना चाहिए कि आवेदन किस आधार पर स्वीकार किया गया, कौन से दस्तावेज लगाए गए, किस स्तर पर उनकी जांच हुई और अंतिम आदेश जारी करते समय नियमों की कौन-सी शर्तों का परीक्षण किया गया।
नियम विरुद्ध अनुमति हुई है तो जिम्मेदारी भी उसी क्रम में तय होनी चाहिए, जिस क्रम में निर्णय हुआ। मैदानी कर्मचारी की भूमिका की जांच के साथ उस अधिकारी की भूमिका भी सामने आनी चाहिए जिसने अंतिम अनुमति दी।
मूल नस्ती खोलेगी जिम्मेदारी की असली परत
अब पूरे मामले में मूल नस्ती सबसे महत्वपूर्ण होगी। नक्शा कब स्वीकृत हुआ, 172 का आवेदन कब दिया गया, आरआई ने क्या रिपोर्ट दी और एसडीएम ने किस आधार पर अनुमति दी—इनका रिकॉर्ड मिलान ही तय करेगा कि गलती कहां हुई।
अगर नक्शा पास हुए बिना 172 की अनुमति दी गई, तो सवाल केवल यह नहीं होगा कि आरआई ने क्या किया। सवाल यह भी होगा कि नियमों की अनिवार्य शर्त पूरी हुए बिना आदेश किसने और किस आधार पर जारी किया। यही जांच तय करेगी कि नियम तोड़ने वाला कौन था और अब किसके सिर ठीकरा फोड़ा जा रहा है।








