नई दिल्ली: भारतीय संस्कृति में शादी के बाद महिलाओं के श्रृंगार का खास महत्व माना जाता है। सिंदूर, मंगलसूत्र, बिंदी और चूड़ियों के साथ पैरों में पहनी जाने वाली चांदी की बिछिया भी वैवाहिक जीवन से जुड़ी एक पारंपरिक पहचान है।
देश के अलग-अलग हिस्सों में इसे अलग-अलग नामों से जाना जाता है। कहीं इसे बिछिया या बिछवा कहा जाता है, तो दक्षिण भारत में इसे मेट्टी के नाम से भी जाना जाता है। आमतौर पर इसे पैरों की दूसरी उंगली में पहना जाता है।
विवाह के बाद बिछिया पहनने की परंपरा
कई भारतीय समुदायों में शादी के दौरान दुल्हन को बिछिया पहनाने की रस्म होती है। पारंपरिक रूप से इसे विवाहित महिला के श्रृंगार और वैवाहिक स्थिति से जोड़कर देखा जाता है।
जिस तरह अलग-अलग समुदायों में सिंदूर और मंगलसूत्र को शादी के प्रतीक के तौर पर माना जाता है, उसी तरह बिछिया भी कई परिवारों और क्षेत्रों में विवाह के बाद पहने जाने वाले आभूषणों का हिस्सा है।
बिछिया चांदी की ही क्यों होती है?
परंपरा में बिछिया को आमतौर पर चांदी से बनाया जाता है। इसके पीछे धार्मिक और सांस्कृतिक मान्यताएं जुड़ी हुई हैं। हिंदू परंपरा में सोने को पवित्र धातु माना जाता है और शरीर के निचले हिस्से में सोना पहनने को लेकर कई समुदायों में अलग-अलग मान्यताएं हैं।
इसी वजह से पैरों में पहने जाने वाले आभूषणों, जैसे पायल और बिछिया, के लिए चांदी का इस्तेमाल लंबे समय से होता आया है। हालांकि भारत के अलग-अलग क्षेत्रों में आभूषण पहनने की परंपराएं अलग हो सकती हैं।
स्वास्थ्य से जुड़े दावों के पीछे क्या है?
बिछिया को लेकर आयुर्वेद और पारंपरिक चिकित्सा पद्धतियों में कई मान्यताएं मिलती हैं। माना जाता है कि पैरों की दूसरी उंगली में बिछिया पहनने से वहां हल्का दबाव पड़ता है और शरीर के कुछ प्रेशर प्वाइंट प्रभावित होते हैं।
कुछ पारंपरिक मान्यताएं इसे महिलाओं के मासिक धर्म और प्रजनन स्वास्थ्य से भी जोड़ती हैं। हालांकि, इन दावों को आधुनिक चिकित्सा विज्ञान में स्थापित तथ्य मानने से पहले वैज्ञानिक प्रमाणों को ध्यान में रखना जरूरी है।
मासिक धर्म और प्रजनन स्वास्थ्य से जोड़ने की मान्यता
पारंपरिक भारतीय चिकित्सा में पैरों की कुछ उंगलियों और शरीर के आंतरिक अंगों के बीच संबंध बताए गए हैं। इसी आधार पर बिछिया को महिलाओं के प्रजनन तंत्र और मासिक धर्म चक्र से जोड़ने की मान्यता भी प्रचलित है।
हालांकि, बिछिया पहनने से मासिक धर्म नियमित होने या प्रजनन क्षमता बढ़ने जैसे दावों के लिए पर्याप्त वैज्ञानिक प्रमाण उपलब्ध नहीं हैं।
चांदी को लेकर क्या मान्यता है?
चांदी को पारंपरिक चिकित्सा में ठंडी प्रकृति वाली धातु माना गया है। इसी वजह से चांदी के आभूषणों को शरीर के लिए अनुकूल मानने की परंपरा रही है। बिछिया को भी इसी सांस्कृतिक और पारंपरिक सोच का हिस्सा माना जाता है।
लेकिन शरीर का तापमान नियंत्रित करने या किसी बीमारी का इलाज करने के लिए चांदी की बिछिया को वैज्ञानिक उपचार नहीं माना जाना चाहिए।
पहनते समय इन बातों का रखें ध्यान
अगर आप नियमित रूप से बिछिया पहनती हैं, तो उसका आकार सही होना जरूरी है। बहुत ज्यादा टाइट बिछिया पहनने से पैर की उंगली में दबाव, दर्द, लाल निशान









