BREAKING

बड़ी खबर

फैशन नहीं, इन मान्यताओं से जुड़ा है पैर में काला धागा पहनना

आज के दौर में पैरों में काला धागा पहनना फैशन का हिस्सा भी बन गया है। कई लोग इसे एंकलेट या पायल के साथ स्टाइल करते हैं। हालांकि, भारतीय परंपराओं में काले धागे को केवल सजावटी चीज नहीं माना गया है। इसे लंबे समय से नजर दोष और नकारात्मक प्रभावों से बचाव से जुड़ी मान्यताओं के साथ देखा जाता रहा है।

नजर दोष से बचाव की मान्यता

काले धागे को कई परिवारों में नजरबट्टू के रूप में इस्तेमाल किया जाता है। बच्चों को काला टीका लगाने से लेकर घर और वाहनों पर काली चीजें लगाने तक, ऐसी कई परंपराएं भारतीय समाज में प्रचलित हैं। इसी तरह पैरों में काला धागा बांधने को भी बुरी नजर से बचाव का एक पारंपरिक उपाय माना जाता है।

शनि से जुड़ा है काला रंग

ज्योतिषीय मान्यताओं में काले रंग का संबंध शनि ग्रह से बताया जाता है। इसी वजह से कुछ लोग काले धागे को शनि से जुड़े उपाय के तौर पर भी पहनते हैं। मान्यता है कि इससे शनि के प्रतिकूल प्रभावों को कम करने में मदद मिल सकती है। हालांकि, ये धार्मिक और ज्योतिषीय मान्यताएं हैं, जिनका वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है।

शनिवार को पहनने की परंपरा

क्योंकि काले रंग को शनि से जोड़ा जाता है, इसलिए ज्योतिष की कुछ परंपराओं में शनिवार को काला धागा पहनना उचित माना गया है। कुछ जगहों पर मंगलवार को भी इसे पहनने की परंपरा मिलती है। अलग-अलग परंपराओं में इसे पहनने के तरीके और नियम भी अलग हो सकते हैं।

काला धागा पहनने की प्रमुख वजहें

काले धागे से जुड़ी मान्यताओं में मुख्य रूप से तीन बातें सामने आती हैं—

  • नजर दोष से बचाव: इसे नजरबट्टू के तौर पर पहनने की परंपरा है।
  • नकारात्मक प्रभाव से सुरक्षा: कुछ मान्यताओं में इसे नकारात्मक ऊर्जा से बचाव का प्रतीक माना जाता है।
  • शनि से संबंध: ज्योतिष में काले रंग को शनि से जोड़कर देखा जाता है।

आज फैशन का भी हिस्सा

धार्मिक मान्यताओं के अलावा आज काला धागा युवाओं के बीच फैशन एक्सेसरी के रूप में भी लोकप्रिय है। इसे पायल, एंकलेट या अन्य फुट एक्सेसरीज के साथ पहना जाता है। यानी किसी के लिए यह परंपरा का हिस्सा है तो किसी के लिए सिर्फ स्टाइल स्टेटमेंट।

पहनने से पहले मान्यताओं को समझें

काले धागे को लेकर अलग-अलग क्षेत्रों और ज्योतिषीय परंपराओं में अलग नियम बताए जाते हैं। इसलिए इसे पहनने से जुड़ी मान्यताओं को धार्मिक विश्वास के रूप में ही देखना उचित है। इसके प्रभावों को लेकर कोई वैज्ञानिक प्रमाण उपलब्ध नहीं है।

Leave A Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Related Posts