आम आदमी पार्टी (AAP) के लिए शुक्रवार का दिन किसी ‘ब्लैक फ्राइडे’ से कम नहीं रहा। राघव चड्ढा समेत 7 राज्यसभा सांसदों के इस्तीफे और भारतीय जनता पार्टी (BJP) में विलय की घोषणा ने इसे सिर्फ दलबदल नहीं, बल्कि अरविंद केजरीवाल की राजनीतिक पकड़ में बड़ी दरार के रूप में सामने रखा है।
अब सवाल यह उठ रहा है कि क्या यह केवल सांसदों के पाला बदलने तक सीमित है या राघव चड्ढा पर्दे के पीछे वही रणनीति अपना रहे हैं, जो उद्धव ठाकरे और शरद पवार के साथ महाराष्ट्र की राजनीति में देखने को मिली थी।
राघव चड्ढा का दावा है कि राज्यसभा में AAP के 10 में से 7 सांसद, यानी दो-तिहाई से ज्यादा, उनके साथ हैं। सामान्य तौर पर यह आंकड़ा दलबदल विरोधी कानून से बचने के लिए पर्याप्त माना जाता है।
लेकिन पूर्व लोकसभा महासचिव पी.डी.टी. आचार्य का मत अलग है। उनके अनुसार, केवल संसदीय दल का नहीं बल्कि “मूल पार्टी” का किसी दूसरी पार्टी में विलय होना जरूरी है। यहीं से पूरा मामला पेचीदा हो जाता है।
एकनाथ शिंदे और अजित पवार की तरह राघव चड्ढा की रणनीति भी उसी दिशा में जाती दिख रही है:
- संख्या बल दिखाना – राज्यसभा में दो-तिहाई समर्थन जुटाना
- ‘असली पार्टी’ का दावा – चुनाव आयोग में बहुमत का आधार पेश करना
- नेतृत्व को चुनौती देना – यदि दावा सफल रहा तो केजरीवाल कमजोर पड़ सकते हैं
अगर राघव चड्ढा यह साबित कर देते हैं कि संगठन और निर्वाचित प्रतिनिधियों का बहुमत उनके पास है, तो पार्टी का नाम और चुनाव चिह्न उनके गुट को मिल सकता है।
राघव चड्ढा और केजरीवाल के बीच दूरी तब बढ़ी जब राघव को राज्यसभा में उप-नेता पद से हटाया गया। राघव का कहना है कि उन्हें गलत फैसलों का हिस्सा न बनने की सजा दी गई। वहीं संजय सिंह जैसे नेता उन्हें ‘गद्दार’ बता रहे हैं। अब यह विवाद विचारधारा से आगे बढ़कर राजनीतिक अस्तित्व की लड़ाई बन चुका है।
अगर राघव चड्ढा चुनाव आयोग का रुख करते हैं, तो मामला लंबा खिंच सकता है। इस दौरान असली पार्टी कौन है, यह तय होने तक व्हिप जारी करने का अधिकार किसके पास होगा, यह बड़ा सवाल रहेगा। वहीं, राघव का अगला कदम पंजाब और दिल्ली के विधायकों को अपने पक्ष में करना हो सकता है अगर वे इसमें सफल होते हैं, तो केजरीवाल के लिए अपनी सरकारों को बचाए रखना मुश्किल हो सकता है।
राघव चड्ढा का यह कदम केवल दलबदल नहीं, बल्कि AAP पर नियंत्रण हासिल करने की कोशिश भी माना जा रहा है। आने वाले समय में यह साफ हो जाएगा कि केजरीवाल अपनी पार्टी को संभाल पाते हैं या राघव चड्ढा ‘शिंदे मॉडल’ की तरह एक नई राजनीतिक मिसाल बनते हैं।









