सुकर त्रयी योजना से मिला एक नर और दो मादा सुअर, बेहतर देखभाल से बढ़ा पशुधन
गांव में ही मिल रहा बिक्री का बाजार, अब सुअर पालन का विस्तार कर आमदनी बढ़ाने की तैयारी
पशुपालन विभाग के सहयोग से गांव में ही स्वरोजगार का मिला अवसर
रायपुर,

पशुपालन ग्रामीण परिवारों के लिए गांव में ही स्वरोजगार और अतिरिक्त आमदनी का प्रभावी माध्यम बन सकता है। सरगुजा जिले के लुण्ड्रा विकासखंड अंतर्गत ग्राम गगोली की श्रीमती धनेश्वरी केरकेट्टा ने पशुपालन विभाग की सुकर त्रयी योजना से मिले सहयोग को आजीविका के अवसर में बदला है। वर्ष 2025 में योजना के तहत मिले एक नर और दो मादा सुअरों से उन्होंने सुअर पालन की शुरुआत की थी। बेहतर देखभाल और मेहनत से अब उन्हें 10 बच्चे प्राप्त हुए हैं। पशुधन की संख्या बढ़ने से धनेश्वरी का उत्साह भी बढ़ा है और अब वे इसे विस्तार देकर अपनी आमदनी बढ़ाने की तैयारी कर रही हैं।

तीन सुअरों से की शुरुआत, अब मिले 10 बच्चे
धनेश्वरी केरकेट्टा को वर्ष 2025 में पशुपालन विभाग की सुकर त्रयी योजना के अंतर्गत एक नर और दो मादा सुअर प्रदान किए गए थे। योजना से मिले इन पशुओं की उन्होंने नियमित देखभाल की। इसका परिणाम यह हुआ कि अब उन्हें 10 बच्चे प्राप्त हुए हैं।
पशुधन में हुई इस वृद्धि ने धनेश्वरी के लिए सुअर पालन को आजीविका के रूप में आगे बढ़ाने की नई संभावना तैयार की है। अब उनका लक्ष्य पशुओं की संख्या बढ़ाकर इसे अधिक व्यवस्थित रूप से आगे ले जाना और परिवार के लिए अतिरिक्त आय का स्थायी साधन विकसित करना है।
गांव में ही मिल जाता है बाजार, बिक्री की राह भी आसान
धनेश्वरी के लिए सुअर पालन की एक बड़ी सुविधा स्थानीय स्तर पर इसकी मांग होना भी है। वे बताती हैं कि गांव में ही सुअरों और उनके बच्चों की बिक्री हो जाती है, जिससे बाजार तक पहुंचने की बड़ी परेशानी नहीं होती।
धनेश्वरी कहती हैं, “गांव में ही सुअर बिक जाते हैं। आगे संख्या बढ़ने पर हम इन्हें मंडी में भी बेचेंगे।” स्थानीय स्तर पर बिक्री की सुविधा और बढ़ते पशुधन से उन्हें भविष्य में आमदनी बढ़ने की उम्मीद है। वे सुअर पालन को विस्तार देकर परिवार की आर्थिक स्थिति को और मजबूत करना चाहती हैं।
पशुपालन विभाग के सहयोग से गांव में ही स्व-रोजगार की राह
धनेश्वरी ने पशुपालन विभाग के प्रति आभार व्यक्त करते हुए कहा कि विभाग से मिले सहयोग ने उन्हें सुअर पालन शुरू करने और इसे आगे बढ़ाने का अवसर दिया है। तीन पशुओं से शुरू हुई उनकी यह पहल अब 10 बच्चों के साथ आगे बढ़ रही है।
सेवा संकल्प अभियान के तहत धनेश्वरी की यह ‘सेवा की कहानी’ बताती है कि पशुपालन योजनाओं से मिला शुरुआती सहयोग, हितग्राही की मेहनत और स्थानीय बाजार की उपलब्धता मिलकर ग्रामीण परिवारों के लिए गांव में ही स्व-रोजगार और अतिरिक्त आमदनी की संभावनाएं तैयार कर सकते हैं।







