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सरप्लस से संकट तक पहुंची चीनी, उत्पादन घटा तो आसमान छूने लगे दाम

चीनी की कीमतों में बढ़ोतरी की सबसे बड़ी वजह घरेलू बाजार में उपलब्धता को लेकर बढ़ती चिंता मानी जा रही है। खास बात यह है कि मौजूदा चीनी सीजन की शुरुआत में देश में रिकॉर्ड उत्पादन और पर्याप्त सरप्लस की उम्मीद जताई गई थी। इसी अनुमान के आधार पर सरकार ने चीनी के निर्यात की भी अनुमति दी थी। लेकिन बाद में उत्पादन के अनुमान लगातार घटते गए और बाजार की तस्वीर बदल गई।

सरप्लस का अनुमान कैसे बदला?

चीनी का मौजूदा सीजन 1 अक्टूबर 2025 से शुरू होकर 30 सितंबर 2026 तक चलेगा। शुरुआत में इंडियन शुगर एंड बायो-एनर्जी मैन्युफैक्चरर्स एसोसिएशन (ISMA) ने करीब 3.49 करोड़ टन उत्पादन का अनुमान लगाया था। यह पिछले सीजन के करीब 2.96 करोड़ टन उत्पादन से काफी अधिक था। उत्पादन बढ़ने की उम्मीद के चलते सरकार ने सीजन के दौरान चीनी निर्यात की भी अनुमति दी।

लेकिन कुछ महीनों बाद उत्पादन के अनुमान में लगातार कटौती होने लगी। फरवरी में उत्पादन का अनुमान घटकर करीब 3.24 करोड़ टन और अप्रैल में करीब 3.20 करोड़ टन रह गया। महाराष्ट्र और कर्नाटक जैसे प्रमुख चीनी उत्पादक राज्यों में गन्ने की पैदावार प्रभावित होने से उत्पादन पर असर पड़ा।

अब सरकार के अनुमान के मुताबिक 2025-26 सीजन में कुल चीनी उत्पादन करीब 3.06 करोड़ टन रह सकता है। इसमें से करीब 29 लाख टन चीनी इथेनॉल उत्पादन में इस्तेमाल होने की संभावना है। साथ ही करीब 8 लाख टन चीनी का निर्यात भी हो चुका है। ऐसे में घरेलू बाजार के लिए उपलब्ध चीनी की मात्रा पर दबाव बढ़ गया है।

कुछ ही दिनों में रिकॉर्ड स्तर पर पहुंचे दाम

चीनी की कीमतों में तेजी जून के आखिर से ही दिखाई देने लगी थी। अगस्त के पहले सप्ताह में महाराष्ट्र और उत्तर प्रदेश की मिलों से निकलने वाली चीनी की कीमत करीब 4,880 से 4,980 रुपये प्रति 100 किलो तक पहुंच गई थी। इसके बाद 18 अगस्त को कीमत करीब 5,350 रुपये प्रति 100 किलो तक पहुंच गई।

19 अगस्त को उत्तर प्रदेश में मिल-गेट कीमत करीब 5,850 रुपये प्रति 100 किलो तक पहुंच गई, जबकि कुछ दिन पहले यह करीब 4,830 रुपये प्रति 100 किलो थी। कर्नाटक में भी 20 अगस्त को कीमत करीब 7,100 रुपये प्रति 100 किलो तक पहुंचने की खबर सामने आई।

तेजी से बढ़ती कीमतों के बीच सरकार ने चीनी के स्टॉक को लेकर नियम भी सख्त किए। बड़े औद्योगिक खरीदारों को सितंबर से अपनी जरूरत के 15 दिनों से अधिक का चीनी स्टॉक रखने की अनुमति नहीं होगी। सरकार ने करीब एक दशक बाद चीनी आयात को भी मंजूरी दी और 100 फीसदी आयात शुल्क हटाते हुए 10 लाख टन चीनी आयात की अनुमति दी।

इथेनॉल नीति का कितना असर?

चीनी बाजार में मौजूदा स्थिति को समझने में इथेनॉल नीति भी महत्वपूर्ण है। सीजन की शुरुआत में अनुमान लगाया गया था कि इथेनॉल बनाने के लिए करीब 45 से 50 लाख टन चीनी के बराबर मात्रा इस्तेमाल हो सकती है। हालांकि, बाद में यह अनुमान घट गया और मौजूदा अनुमान करीब 30 लाख टन का है।

सरकार का कहना है कि हालिया कीमत वृद्धि के लिए इथेनॉल को जिम्मेदार ठहराना सही नहीं है। सरकार के मुताबिक कीमतों में तेजी के पीछे उम्मीद से कम उत्पादन, त्योहारों के दौरान बढ़ती मांग, खराब मौसम से फसल को नुकसान, वैश्विक आपूर्ति की स्थिति और बाजार में कारोबार जैसे कई कारण हैं।

सरकार ने यह भी बताया कि इथेनॉल बनाने में इस्तेमाल होने वाली चीनी का हिस्सा 2022-23 में करीब 12 फीसदी था, जो 2025-26 में घटकर करीब 9 फीसदी रह गया है। ऐसे में सरकार का फोकस त्योहारों के दौरान घरेलू बाजार में पर्याप्त चीनी उपलब्ध कराने और कीमतों को नियंत्रित रखने पर है।

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