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संसद को चलाने के लिए हर मिनट कितना खर्च? मॉनसून सत्र में तो पश्नकाल की भी चढ़ गई बलि

संसद का मॉनसून सत्र लगातार हंगामे, नारेबाजी और राजनीतिक गतिरोध के बाद आखिरकार अनिश्चितकाल के लिए स्थगित कर दिया गया। 20 जुलाई से 13 अगस्त तक यानी कि 19 दिनों के इस सत्र में कानून तो पास हुए, लेकिन बहस, सरकार से सवाल-जवाब और जनता से जुड़े मुद्दों पर चर्चा के आंकड़े निराशाजनक रहे। हंगामे की आड़ में न सिर्फ करदाताओं का करोड़ों रुपया व्यर्थ गया, बल्कि संसद में लोकतंत्र का सबसे अहम जरिया प्रश्नकाल सबसे बड़ा शिकार बना।

संसद में व्यवधान के आर्थिक नुकसान को समझने के लिए साल 2012 का एक आंकड़ा अक्सर उदाहरण के तौर पर देखा जाता है। तत्कालीन संसदीय कार्य मंत्री पवन कुमार बंसल के अनुसार, संसद चलाने में हर मिनट करीब 2.5 लाख रुपये का खर्च आता है। इनमें लोकसभा और राज्यसभा दोनों का खर्चा शामिल है। अगर इस आंकड़े में महंगाई को जोड़ दिया जाए तो आज यह खर्च कहीं ज्यादा होगा।

पीआरएस लेजिस्लेटिव रिसर्च (PRS) के आंकड़ों के मुताबिक, सत्र के शुरुआती तीन दिनों में ही लोकसभा के 1,026 मिनट और राज्यसभा के 816 मिनट बर्बाद हुए। 2.5 लाख रुपये प्रति मिनट के पुराने फॉर्मूले से भी देखें तो शुरुआती 3 दिनों में ही लगभग 23 करोड़ रुपये का नुकसान दर्ज किया गया। आपको बता दें कि संसद की इमारत, सुरक्षा, इंफ्रास्ट्रक्चर और कर्मचारियों का खर्च लगातार जारी रहता है। चाहे कार्यवाही चले या स्थगित रहे।

संसदीय लोकतंत्र में प्रश्नकाल (Question Hour) वह समय होता है जब कोई भी सांसद मंत्रियों से उनके विभागों, नीतियों, पेपर लीक, बेरोजगारी, स्वास्थ्य या सरकारी खर्च को लेकर सीधे सवाल यानी कि तारंकित प्रश्न पूछ सकता है और पूरक सवाल भी दाग सकता है। पीआरएस के अनुसार, विधायी कार्यों के लिए तो समय बढ़ाकर नुकसान की भरपाई की जा सकती है, लेकिन प्रश्नकाल का समय बीत जाने के बाद उसकी भरपाई दोबारा नहीं हो सकती।

16वीं लोकसभा में प्रश्नकाल अपने तय समय का महज 67% काम कर पाया था। वहीं, हाल के वर्षों के आंकड़ों के अनुसार, यह औसतन 59% ही चला। 2023 के मॉनसून सत्र में तो राज्यसभा में 8 दिन ऐसे रहे जब प्रश्नकाल 1 मिनट भी नहीं चल सका।

जब हंगामे के कारण समय कम बचता है तब दो स्थितियां बनती हैं। या तो विधेयक लंबित रह जाते हैं या फिर बिना किसी गहन चर्चा के हड़बड़ी में पारित कर दिए जाते हैं। उदाहरण के लिए 2023 के सत्र में लोकसभा ने 20 विधेयकों को 1 घंटे से भी कम समय की चर्चा में पारित कर दिया था, जिनमें से 9 बिल तो 20 मिनट के भीतर पास हो गए थे। इस बार के मॉनसून सत्र में भी कई विधेयकों के साथ यही स्थिति देखने को मिली। संसदीय समितियां कानूनों की समीक्षा करती हैं, लेकिन सदन के पटल पर होने वाली सार्वजनिक बहस का विकल्प समितियां नहीं हो सकतीं।

हंगामे के पीछे राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप का एक पुराना पैटर्न है। सत्तापक्ष का आरोप रहता है कि विपक्ष सिर्फ हंगामा करके करदाताओं के पैसे की बर्बादी कर रहा है और चर्चा से भाग रहा है। वहीं, विपक्षी दलों का कहना है कि जब सरकार नीट (NEET) विवाद, राम मंदिर दान मामले या अन्य संवेदनशील जनहित के मुद्दों पर चर्चा की अनुमति नहीं देती है तो विरोध प्रदर्शन ही एकमात्र रास्ता बचता है।

करदाता केवल इसलिए पैसा नहीं चुकाते कि संसद से कानून पास होते रहें, बल्कि इसलिए भी देते हैं ताकि उनके चुने हुए प्रतिनिधि सरकार से जवाब मांग सकें, नीतियों की खामियां उजागर कर सकें और सार्वजनिक धन का हिसाब ले सकें।

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