70 और 80 के दशक में हिंदी सिनेमा की कई अभिनेत्रियों ने अपनी सादगी और दमदार अभिनय से दर्शकों के बीच खास पहचान बनाई। रंजीता कौर भी उन्हीं अभिनेत्रियों में शामिल थीं। फिल्म एंड टेलीविजन इंस्टीट्यूट से अभिनय की ट्रेनिंग लेने के बाद उन्होंने 1976 में फिल्म ‘लैला मजनूं’ से बॉलीवुड में कदम रखा। इस फिल्म में उनके साथ ऋषि कपूर नजर आए थे और फिल्म की सफलता ने रंजीता को रातों-रात चर्चा में ला दिया।
डेब्यू के बाद रंजीता के पास फिल्मों की लाइन लग गई। ‘पति पत्नी और वो’ में उनके अभिनय को दर्शकों ने पसंद किया, जबकि ‘अँखियों के झरोखों से’ में उन्होंने एक भावुक किरदार निभाकर अपनी अभिनय क्षमता साबित की। मिथुन चक्रवर्ती के साथ उनकी जोड़ी भी पर्दे पर काफी लोकप्रिय हुई। दोनों ने ‘तराना’ और ‘सुरक्षा’ जैसी फिल्मों में साथ काम किया। इसी दौरान दोनों के रिश्ते को लेकर फिल्मी गलियारों में तरह-तरह की चर्चाएं भी सामने आने लगीं।
रंजीता ने अपने करियर में अमिताभ बच्चन के साथ ‘सत्ते पे सत्ता’, विनोद खन्ना के साथ ‘राजपूत’ और अमोल पालेकर के साथ ‘दामाद’ जैसी फिल्मों में भी काम किया। उनकी फिल्मों की विविधता ने उन्हें अलग पहचान दिलाई।
हालांकि करियर के एक दौर में लगातार कुछ फिल्मों के असफल होने के बाद उनकी लोकप्रियता पर असर पड़ा। फिल्मों के चुनाव और व्यक्तिगत परिस्थितियों को लेकर भी उनके करियर में उतार-चढ़ाव देखने को मिला। धीरे-धीरे उन्होंने फिल्मों से दूरी बनानी शुरू कर दी और 90 के दशक तक आते-आते अभिनय की दुनिया से लगभग पूरी तरह दूर हो गईं।
रंजीता के अभिनय को फिल्मफेयर ने भी मान्यता दी। उन्हें ‘अँखियों के झरोखों से’ के लिए बेस्ट एक्ट्रेस और ‘पति पत्नी और वो’ तथा ‘तेरी कसम’ के लिए बेस्ट सपोर्टिंग एक्ट्रेस की श्रेणी में नामांकन मिला। हालांकि वह इन नामांकनों को अवॉर्ड में तब्दील नहीं कर सकीं, लेकिन हिंदी सिनेमा में उनका योगदान आज भी याद किया जाता है।








