रायपुर। डिजिटल सुशासन का सशक्त मॉडल से शिक्षा के अधिकार को एक नया आसमान मिल रहा है। भारत में शिक्षा को मौलिक अधिकार का दर्जा मिलने के बाद से लगातार यह प्रयास किए जा रहे हैं कि हर बच्चे तक शिक्षा का उजाला पहुंच सके। हमारे देश मे एक लंबे समय तक यह देखा गया कि नीतियां तो जरूर बनाई जाती रही मगर जमीन पर उसके क्रियान्वयन में पारदर्शिता और पहुंच की कमी बनी रहती थी। ऐसे समय में छत्तीसगढ़ की साय सरकार ने जो करके दिखाया है आज उसकी मिसाल दी जा रही है। प्रदेश भर मे मुख्यमंत्री साय के नेतृत्व में डिजिटल सुशासन के जरिए शिक्षा के अधिकार (RTE) को वास्तविक रूप में लागू किया जा रहा है।
यह कदम तकनीकी सुधार ही नई बल्कि सामाजिक न्याय, समान अवसर और पारदर्शिता की दिशा में भी एक क्रांतिकारी पहल है।
शिक्षा का अधिकार अधिनियम के अंतर्गत निजी विद्यालयों में 25 प्रतिशत सीटें आर्थिक रूप से कमजोर और वंचित वर्ग के बच्चों के लिए आरक्षित किया गया है। पहले यही प्रक्रिया जटिल, समय लेने वाली और कई बार विवादों से घिरी रहने वाली होती थी।
मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय ने इस चुनौती को समझा और पूरी प्रक्रिया को डिजिटल प्लेटफॉर्म पर स्थानांतरित कर दिया। अब आवेदन करने से लेकर चयन तक स्टेप ऑनलाइन और औटोमेटिक हो गया है, जिससे मानवीय हस्तक्षेप स्वयमेव कम हो गया है। पक्षपात की संभावना पूरी तरह से समाप्त हो गई है साथ ही पारदर्शिता और भरोसा बढ़ा है।
डिजिटल प्रक्रिया का सबसे इम्पॉर्टन्ट पार्ट है ऑनलाइन लॉटरी सिस्टम। उदाहरण के तौर पर शैक्षणिक सत्र 2026-27 में कुल 38,439 आवेदन प्राप्त हुए थे जिनमे 27,203 आवेदन पात्र पाए गए और इन पात्र आवेदन से 14,403 बच्चों का ऑनलाइन लॉटरी के माध्यम से चयन किया गया। पूरी तरह कंप्यूटर आधारित और रैंडमाइज्ड होने वाली इस प्रक्रिया से किसी भी प्रकार की सिफारिश या पक्षपात की गुंजाइश अपने आप समाप्त हो जाती है। राज्य सरकार का यह कदम सुनिश्चित करता है कि हर बच्चे को समान अवसर मिले जो लोकतांत्रिक व्यवस्था की मूल भावना है
डिजिटल प्रणाली में चयन के साथ डिजिटल सत्यापन को भी शामिल किया गया है। इस प्रणाली मे आवेदन के दौरान दस्तावेजों की ऑनलाइन जांच,पात्रता की स्वचालित पुष्टि, गलत जानकारी की तत्काल पहचान कर ली जाती है। जिससे यह पूरी प्रक्रिया अधिक विश्वसनीय और त्रुटिरहित बन जाती है।
डिजिटल प्रणाली का बड़ा लाभ आम नागरिकों को भी मिल रहा है। अब अभिभावकों को स्कूलों या कार्यालयों के चक्कर नहीं लगाने पड़ते क्योंकि वे अब घर बैठे ऑनलाइन आवेदन कर सकते हैं। मोबाइल नंबर के जरिए सत्यापन और अपडेट प्राप्त कर सकते हैं। आवेदन करते समय सिस्टम के द्वारा 1.5 किलोमीटर के दायरे में आने वाले निजी स्कूलों की सूची और उपलब्ध सीटों की जानकारी भी उपलब्ध हो जाती है। इस सुविधा से अभिभावकों को सही निर्णय लेने में मदद मिलती है।
इस योजना के उद्देश्य के मूल मे ही समाज के उन कमजोर वर्गों को मुख्यधारा में लाना है जो अब तक अपने पिछड़ेपन की वजह से ज्ञान और शिक्षा से वंचित रहे। इस उद्देश्य को पूरा करने के लिए इस योजना मे अनुसूचित जाति (SC),अनुसूचित जनजाति दिव्यांग और अन्य आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के बच्चों को प्राथमिकता दी जाती है। छत्तीसगढ़ की साय सरकार की यह पहल सामाजिक समावेशन को मजबूत करने वाली और समानता की दिशा में ठोस कदम साबित हो रही है।
वर्तमान मे छत्तीसगढ़ में इस योजना से 3 लाख 63 हजार से अधिक विद्यार्थी लाभान्वित हो रहे हैं। इसके अतिरिक्त राज्य की साय सरकार ने वर्ष 2026-27 के लिए 300 करोड़ रुपये की शुल्क प्रतिपूर्ति का प्रावधान किया है, जिससे और भी अधिक बच्चों को लाभ मिल सकेगा और निजी विद्यालयों में प्रवेश प्रक्रिया और मजबूत होगी। यह आंकड़े इस बात का प्रमाण हैं कि यह कदम केवल कागजों तक ही सीमित नहीं होगा बल्कि जमीनी स्तर पर इसके प्रभाव को देखा जा सकेगा।
इस डिजिटल प्रक्रिया की सफलता इस बात से ही साबित हो जाती है कि छत्तीसगढ़ के लगभग सभी जिलों में हजारों बच्चों को इसका लाभ मिल रहा है। रायपुर, बिलासपुर, कोरबा, दुर्ग, सरगुजा, जशपुर, बस्तर जैसे क्षेत्रों से बड़ी संख्या में बच्चों का चयन हुआ है। सुदूर प्रांतों से बच्चों का चयन यह दर्शाता है कि यह योजना केवल शहरी क्षेत्रों तक सीमित नहीं है बल्कि ग्रामीण और दूरस्थ इलाकों तक भी सफलता पूर्वक पहुंची है।
RTE के अलावा भी मुख्यमंत्री विष्णु देव साय के नेतृत्व में छत्तीसगढ़ में कई डिजिटल सुधार किए जा चुके हैं जैसे e-Office प्रणाली,CMO पोर्टल, स्मार्ट क्लासरूम, विद्या समीक्षा केंद्र इत्यादि इन सभी कदमों का उद्देश्य छत्तीसगढ़ प्रशासन को अधिक पारदर्शी, जवाबदेह और प्रभावी बनाना ही रहा है।
शिक्षा के क्षेत्र में डिजिटल बदलाव को और मजबूत करने के लिए छात्रों को 12 अंकों की एक विशिष्ट पहचान देने वाली APAAR ID जैसी पहल भी महत्वपूर्ण है। यह ID उनके पूरे शैक्षणिक रिकॉर्ड को डिजिटल रूप में सुरक्षित रखने का कम करती है, जिससे भविष्य में बच्चों को स्कूल बदलने में आसानी होगी, रिकॉर्ड की पारदर्शिता बनी रहेगी और शिक्षा प्रणाली की दक्षता बढ़ेगी।
इस महा परिवर्तन के पीछे मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय की स्पष्ट सोच और प्रतिबद्धता साफ दिखाई देती है क्योंकि वे दृढ़ता से इस बात के पक्षधर हैं कि “कोई भी बच्चा केवल आर्थिक अभाव के कारण शिक्षा से वंचित नहीं रहना चाहिए।” उनकी यही सोच इस डिजिटल RTE मॉडल की नींव है।
डिजिटल प्रक्रिया ने शिक्षा को अधिक समावेशी, अधिक सुलभ और अधिक पारदर्शी बनाने का कम किया है परिणामस्वरूप अब हर पात्र बच्चे को समान अवसर मिल रहा है जिससे समाज में असमानता कम होगी और विकास की गति तेज होगी। छत्तीसगढ़ में RTE के तहत लागू की गई पारदर्शी डिजिटल प्रक्रिया एक प्रशासनिक सुधार भी है और एक बड़ा सामाजिक परिवर्तन भी।
प्रदेश के मुख्यमंत्री के नेतृत्व में यह पहल यह साबित करती है कि नई और आधुनिक तकनीक का उचित उपयोग करके शासन को अधिक प्रभावी और जनहितकारी बनाया जा सकता है। उम्मीद की जा रही है कि यह मॉडल राज्य के हजारों बच्चों के सपनों को साकार करते हुए पूरे देश के लिए एक प्रेरणा भी बन सकता है। डिजिटल सुशासन के इस युग में छत्तीसगढ़ ने यह साबित कर दिया है कि तकनीक का सही उपयोग किया जाए तो हर बच्चे तक शिक्षा का अधिकार पहुंचाया जा सकता है।









