देश की राजनीति में पिछले दिनों कुछ ऐसा हुआ, जिसने पंजाब में भाजपा की स्थिति को पूरी तरह से बदल कर रख दिया। आम आदमी पार्टी के सांसद राघव चड्ढा का छह अन्य साथियों के साथ भाजपा में आना राज्यसभा में सत्ताधारी पार्टी की स्थिति को और भी ज्यादा मजबूत करता है। इसके अलावा यह भाजपा को कुछ ऐसा भी देता है, जिसे भाजपा कभी भी अपने दम पर हासिल नहीं कर पाई है। पंजाब में भाजपा की स्थिति मजबूत नहीं है। 2022 के विधानसभा चुनाव में पार्टी को केवल 6.6 फीसदी वोट मिले थे। राज्य में शिरोमणि अकाली दल के साथ गठबंधन बनाकर रखने वाली पार्टी आज राज्य की 86 फीसदी राज्यसभा सीटों पर कब्जा करके बैठी है।
देश की राजनीति में पिछले दिनों कुछ ऐसा हुआ, जिसने पंजाब में भाजपा की स्थिति को पूरी तरह से बदल कर रख दिया। आम आदमी पार्टी के सांसद राघव चड्ढा का छह अन्य साथियों के साथ भाजपा में आना राज्यसभा में सत्ताधारी पार्टी की स्थिति को और भी ज्यादा मजबूत करता है। इसके अलावा यह भाजपा को कुछ ऐसा भी देता है, जिसे भाजपा कभी भी अपने दम पर हासिल नहीं कर पाई है। पंजाब में भाजपा की स्थिति मजबूत नहीं है। 2022 के विधानसभा चुनाव में पार्टी को केवल 6.6 फीसदी वोट मिले थे। राज्य में शिरोमणि अकाली दल के साथ गठबंधन बनाकर रखने वाली पार्टी आज राज्य की 86 फीसदी राज्यसभा सीटों पर कब्जा करके बैठी है।
2022 के विधानसभा चुनाव में भाजपा को पंजाब में करारी हार का सामना करना पड़ा। 2 विधानसभा सीटों के आधार पर पार्टी अपना कोई राज्यसभा सांसद भी नहीं बना सकती थी। ऐसे में केंद्र की सत्ताधारी पार्टी ने लोकसभा में अपना बेस मजूबत करने की कोशिश की। लेकिन आप की मजबूत चुनावी अभियान ने और शिरोमणि अकाली दल से साथी की अलग होने की वजह से भाजपा को यहां भी एक भी सीट नहीं मिली। हालांकि, भाजपा 19 फीसदी वोट हासिल करने में कामयाब रही, लेकिन सीटें उसे न मिली। लोकसभा चुनाव के प्रदर्शन ने राज्य में भाजपा की स्थिति को अजीब कर दिया। केंद्र में सत्ताधारी पार्टी का राज्य से संसद में नेतृत्व ही नहीं था। हालात यहां तक आ गए कि राज्य में भाजपा के सबसे बड़े चेहरे रवनीत सिंह बिट्टू को भी राज्यसभा भेजने के लिए पार्टी को राजस्थान का सहारा लेना पड़ा।2022 के विधानसभा चुनाव में जीत से उत्साहित आम आदमी पार्टी को अपनी सीटों के आधार पर सात राज्यसभा सांसद भेजने का मौका मिला। पार्टी ने मुख्य तौर पर इसे कार्यकर्ताओं को न भेजकर धनी व्यवसायियों और बड़े चेहरों को भेजने पर भरोसा जताया। राज्य में इसे लेकर विरोध भी हुआ लेकिन पार्टी अपने स्टैंड पर कायम रही। पार्टी ने राघव चड्ढा को, संदीप पाठक, अशोक मित्तल, विक्रमजीत शाहनी औऱ रजिंदर गुप्ता जैसे बड़े व्यवसायियों को अपना राज्यसभा नेतृत्व दिया। इसके अलावा एक और नाम क्रिकेटर हरभजन सिंह का भी है, जिनकी ज्यादा कोई राजनीतिक पहुंच या विचारधारा सामने नहीं आई थी।
वर्तमान में यह सभी पार्टी को छोड़कर भाजपा में शामिल हो चुके हैं। इनके अलावा दिल्ली से भी एक राज्यसभा सांसद स्वाती मालीवाल भी केजरीवाल पर आरोप लगा पार्टी छोड़ चुकी हैं। अब पंजाब में आप का केवल एक राज्यसभा सांसद है।
इन सातों सांसदों के जाने के बाद पंजाब और दिल्ली की राजनीति में अजीब सी स्थिति बनी हुई है। भाजपा की तरफ से इस पर कोई ज्यादा बात नहीं की गई है, लेकिन पंजाब में अपनी 6 राज्यसभा सीट खोने वाली आम आदमी पार्टी के लिए यह असहज करने वाली स्थिति है। राघव चड्ढा का आड़े हाथों लेते हुए पंजाब सीएम भगवंत मान ने कहा कि भले ही यह नेता पार्टी से अलग हो गए हों, लेकिन राज्य में पार्टी की स्थिति पर इसका कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा। क्योंकि इन सांसदों का कोई जनाधार नहीं है। हालांकि इसी दौरान जब उनसे पूछा गया कि राघव चड्ढा को एक समय पर पंजाब का सुपर सीएम कहा जा रहा था, जबकि बाकी अन्य को राज्यसभा भेजने का विरोध हुआ था। इसका जवाब देते हुए उन्होंने कहा, “पार्टी ने जिन लोगों को सांसद बनाया था, वह सभी अपने-अपने क्षेत्रों के प्रतिष्ठित लोग हैं। इसके अलावा दिमाग पढ़ने की कोई मशीन नहीं आती है।”
भाजपा और आम आदमी पार्टी के बीच हुए इस बदलाव पर कांग्रेस पार्टी ने जमकर मजे लिए। कांग्रेस पार्टी के पंजाब अध्यक्ष राजा वारिंग ने कहा कि आम आदमी पार्टी ने ऐसे लोगों को राज्यसभा भेजा था, जिनकी कोई विचार धारा ही नहीं थी। ऐसे में यह दल-बदल होना ही था। कांग्रेस सांसद मनीष तिवारी ने कहा कि इससे भले ही राज्यसभा में भाजपा को फायदा हो, लेकिन इन सांसदों में से ऐसा कोई भी नहीं है, जो जमीनी स्तर पर मजबूत हो। इनसे भाजपा को नहीं बल्कि कांग्रेस को फायदा होगा।
राघव चड्ढा के भाजपा में आने से पार्टी को कितना लाभ होगा, कितना नहीं यह आने वाले 10 महीने में पता चल जाएगा। क्योंकि पंजाब विधानसभा का चुनाव अगले साल होने वाला है और भाजपा राज्य में अपनी सत्ता बनाने की पूरी कोशिश कर रही है। दूसरी तरफ आम आदमी पार्टी है, जिसके नेता और कार्यकर्ता फिलहाल इस धक्के से उभरने की कोशिश कर रहे हैं।









